🪔 सीता माता (जानकी) जी की आरती (हिंदी) & (English Lyrics) PDF

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सीता माता (जानकी) जी की आरती (हिंदी) –

आरती श्रीजनक दुलारी की।
सीताजी रघुबर प्यारी की – टेक

जगत-जननि जग की विस्तारिणि,
नित्य सत्य साकेत-विहारिणि,
परम दयामयि दीनोद्धारिणि,
मैया भक्तन-हितकारी की
सीता जी……

सती शिरोमणि पति-हित-कारिणि,
पति-सेवा हित वन-वन चारिणि,
पति-हित पति-वियोग-स्वीकारिणि,
त्याग-धर्म-मूरति-धारी की
सीता जी……..

विमल-कीर्ति सब लोकन छाई,
नाम लेत पावन मति आई,
सुमिरत कटत कष्ट दुखदाई,
शरणागत-जन-भय-हारी की
सीता जी………

Sita mata (Janki) Ji Ki Aarti, Hindi (English Lyrics) –

Aarti Shri Janak Dulari Ki.
Sitaji Raghubar Pyari Ki – Tek

Jagat-Janani Jag Ki Vistarini,
Nitya Satya Saket-Viharini,
Param Dayamayi Dinoddharini,
Maiya Bhaktan-Hitkari Ki Sita Ji…

Sati Shiromani Pati-Hit-Karini,
Pati-Seva Hit Van-Van Charini,
Pati-Hit Pati-Viyog-Sweekarini,
Tyag-Dharm-Murti-Dhari Ki Sita Ji…

Vimal-Kirti Sab Lokan Chhai,
Naam Let Pavan Mati Aai,
Sumirat Katat Kasht Dukhadi,
Sharanagat-Jan-Bhay-Hari Ki Sita Ji…

https://shriaarti.in/

सीता माता (जानकी) जी की आरती का सरल भावार्थ हिंदी & English –

Aarti Shri Janak Dulari Ki: This line signifies offering praise and devotion to Sita Ji, who is beloved to King Janaka.

Sitaji Raghubar Pyari Ki – Tek: It acknowledges Sita Ji as the dear wife of Lord Rama, who is also known as Raghubar.

Jagat-Janani Jag Ki Vistarini: Sita Ji is described as the mother of the entire universe and the one who expands the world.

Nitya Satya Saket-Viharini: This line highlights Sita Ji’s eternal existence and her presence in the divine abode of Lord Rama, known as Saket.

Param Dayamayi Dinoddharini: It portrays Sita Ji as the supreme embodiment of compassion and the rescuer of the oppressed.

Maiya Bhaktan-Hitkari Ki Sita Ji: Sita Ji is revered as the divine mother who always works for the welfare and benefit of her devotees.

Sati Shiromani Pati-Hit-Karini: This line praises Sita Ji as the epitome of virtue and righteousness, who always works for the well-being of her husband.

Pati-Seva Hit Van-Van Charini: It depicts Sita Ji as one who diligently serves her husband and tirelessly moves around fulfilling her duties.

Pati-Hit Pati-Viyog-Sweekarini: This line acknowledges Sita Ji’s acceptance of separation from her husband, Lord Rama, while he was in exile.

Tyag-Dharm-Murti-Dhari Ki Sita Ji: It portrays Sita Ji as the embodiment of sacrifice and righteousness, upholding the principles of duty and virtue.

Vimal-Kirti Sab Lokan Chhai: Sita Ji’s pure and virtuous reputation extends to all realms and is known by everyone.

Naam Let Pavan Mati Aai: It describes how devotees, by chanting Sita Ji’s name, gain purity and attain her divine blessings.

Sumirat Katat Kasht Dukhadi: By remembering Sita Ji, all sorrows and hardships are diminished and eliminated.

Sharanagat-Jan-Bhay-Hari Ki Sita Ji: This line indicates that Sita Ji is the dispeller of fears and protector of those who seek refuge in her.

सीता माता (जानकी) जी की आरती का सरल भावार्थ हिंदी –

आरती श्री जनक दुलारी की: यह पंक्ति राजा जनक की प्रिय सीता जी की स्तुति और भक्ति अर्पित करने का प्रतीक है।

सीताजी रघुबर प्यारी की – टेक: यह सीता जी को भगवान राम की प्रिय पत्नी के रूप में स्वीकार करता है, जिन्हें रघुबर के नाम से भी जाना जाता है।

जगत-जननी जग की विस्तारिणी: सीता जी को संपूर्ण ब्रह्मांड की माता और जगत का विस्तार करने वाली बताया गया है।

नित्य सत्य साकेत-विहारिणी: यह पंक्ति सीता जी के शाश्वत अस्तित्व और भगवान राम के दिव्य निवास, जिसे साकेत के नाम से जाना जाता है, में उनकी उपस्थिति पर प्रकाश डालती है।

परम दयामयी दिनोदधारिणी: यह सीता जी को करुणा के सर्वोच्च अवतार और पीड़ितों के उद्धारकर्ता के रूप में चित्रित करता है।

मैया भक्तन-हितकारी की सीता जी: सीता जी को दिव्य मां के रूप में पूजा जाता है जो हमेशा अपने भक्तों के कल्याण और लाभ के लिए काम करती हैं।

सती शिरोमणि पति-हित-कारिणी: यह पंक्ति सीता जी की गुण और धार्मिकता के प्रतीक के रूप में प्रशंसा करती है, जो हमेशा अपने पति की भलाई के लिए काम करती हैं।

पति-सेवा हित वन-वन चारिणी: इसमें सीता जी को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दर्शाया गया है जो लगन से अपने पति की सेवा करती है और अपने कर्तव्यों को पूरा करते हुए अथक रूप से घूमती है।

पति-हित पति-वियोग-स्वीकारिणी: यह पंक्ति सीता जी द्वारा अपने पति, भगवान राम से अलग होने की स्वीकृति को स्वीकार करती है, जब वह वनवास में थे।

त्याग-धर्म-मूर्ति-धारी की सीता जी: यह सीता जी को कर्तव्य और सदाचार के सिद्धांतों को कायम रखते हुए त्याग और धार्मिकता के अवतार के रूप में चित्रित करता है।

विमल-कीर्ति सब लोकन छै: सीता जी की पवित्र और सात्विक प्रतिष्ठा सभी लोकों तक फैली हुई है और सभी लोग इसे जानते हैं।

नाम लेत पावन मति आई: इसमें वर्णन किया गया है कि कैसे भक्त, सीता जी के नाम का जाप करके पवित्रता प्राप्त करते हैं और उनका दिव्य आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

सुमिरत कटत कष्ट दुखादि: सीता जी का स्मरण करने से सभी दुख और कष्ट कम हो जाते हैं और समाप्त हो जाते हैं।

शरणागत-जन-भय-हरि की सीता जी: यह पंक्ति इंगित करती है कि सीता जी भय को दूर करने वाली और उनकी शरण में आने वालों की रक्षा करने वाली हैं।

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सीता माता (जानकी) जी: उनके जीवन का संघर्ष और महत्व

सीता माता (जानकी) जी रामायण के मुख्य चरित्रों में से एक हैं। वे रामचरितमानस, कंब रामायण आदि कई ग्रंथों में उल्लेखित हैं। सीता माता का जन्म मिथिला में हुआ था और वे राजा जनक की ज्येष्ठ पुत्री थीं। उनका विवाह अयोध्या के नरेश राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्री राम से हुआ था।

सीता माता के जीवन का विस्तृत वर्णन रामायण में उपलब्ध है। उनकी साहसिकता, धैर्य और समर्पण को देखकर वे एक आदर्श स्त्री के रूप में जानी जाती हैं। सीता माता के संघर्षों और पराक्रम को जानकर आज की युवा पीढ़ी भी प्रेरित होती है। उनके जीवन से हमें जीने का सही तरीका सीखने को मिलता है।

जन्म और बाल्यकाल

जन्म स्थान

सीता माता का जन्म नेपाल के जनकपुर नामक स्थान पर हुआ था। जनकपुर नेपाल के पूर्वी क्षेत्र में स्थित है। इस शहर को जनकपुर नाम से भी जाना जाता है।

बाल्यकाल की कथाएँ

सीता माता के जन्म के समय, उनकी माता जनक राजा का नामकरण समारोह मना रही थीं। जनक राजा के घर इस समारोह के लिए अनेक ऋषियों और महात्माओं को आमंत्रित किया गया था। इस समारोह में भगवान विष्णु के अवतार भगवान राम भी आए थे।

जनक राजा ने धनुष यज्ञ का आयोजन किया था। इस यज्ञ के दौरान एक विशेष विद्वान ने एक धनुष का परीक्षण करने के लिए उसे तोड़ दिया था। जनक राजा ने देखा कि उस तोड़े हुए धनुष को फिर से जोड़ा नहीं जा सकता है। इसी तरह सीता माता के जन्म के समय, जनक राजा ने एक खतरनाक फल को उगाया था जो उनकी खुशी के साथ उन्हें दिया गया था। फल को तोड़ने के बाद जब उन्होंने उसे काटा, तो उसमें एक सुंदर बच्ची मिली जो सीता माता थीं।

बाल्यकाल में सीता माता को लक्ष्मी के अवतार के रूप में जाना जाता था। उनकी बचपन की कथाओं में बताया जाता है कि उन्होंने बचपन में अनेक लीलाएं कीं जो उनकी असाधारण प्रतिभा को दर्शाती थीं। उन्होंने अपने बचपन के दौरान अन

विवाह और वनवास

विवाह

माता सीता का विवाह भगवान श्रीराम से हुआ था। राम और सीता का विवाह अयोध्या में हुआ था। इस विवाह में सभी देवताओं ने भाग लिया था। इस विवाह के बाद राम और सीता को अयोध्या लौटना पड़ा।

वनवास

राम और सीता के वनवास की अवधि 14 साल थी। राम, सीता और लक्ष्मण ने अपने वनवास के दौरान बहुत से कठिनाईयों का सामना किया। वनवास के दौरान राम ने राक्षस रावण को मार डाला था। राम, सीता और लक्ष्मण ने वनवास के दौरान दंडकारण्य, पंचवटी, रमा तट, चित्रकूट आदि जगहों पर रुका था।

वनवास के दौरान राम, सीता और लक्ष्मण ने धर्म का पालन करते हुए बहुत से तपस्या किए थे। इस अवधि में राम, सीता और लक्ष्मण ने अपने आपको ताकतवर बनाया था। वनवास के दौरान सीता का अपहरण हुआ था जिसके बाद राम ने रावण को मार डाला था।

इस प्रकार, माता सीता के विवाह और वनवास भगवान राम और उनकी शक्तिशाली साथिनों के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

रावण द्वारा हरण

हरण

रावण द्वारा सीता माता का हरण रामायण का एक महत्वपूर्ण घटना है। रावण ने सीता माता को लंका ले जाकर उसे अपनी रानी बनाने का प्रयास किया था। लेकिन सीता माता ने इसे स्वीकार नहीं किया और उसे अपने पति राम की वापसी के लिए दी जाने की मांग की।

अशोक वाटिका

रावण ने सीता माता को लंका ले जाकर अशोक वाटिका में रखा था। यह वाटिका एक सुंदर बगीचा था जो बहुत विस्तृत था। सीता माता ने अशोक वाटिका में रहते हुए बहुत दुखी हो गई थीं। वह राम की याद में रोती रहती थीं और अपनी विपदाओं के बारे में सोचती रहती थीं।

अशोक वाटिका में रहते हुए सीता माता ने बहुत से विपदाओं का सामना किया था। उन्होंने रावण के राक्षसों का सामना किया था और उनकी बर्बरताओं का सामना करना पड़ा था। उन्होंने अपनी स्थिति के बारे में बहुत सोचा और उन्होंने अपने पति राम की याद में रोते हुए बहुत समय बिताया।

इस प्रकार, रावण द्वारा सीता माता का हरण एक अत्यंत दुखद घटना थी। उन्होंने अपनी विपदाओं का सामना किया और उन्होंने अपने पति राम की याद में रोते हुए अशोक वाटिका में बहुत समय बिताया।

अयोध्या लौटना और अग्नि परीक्षा

राम जी के वनवास के बाद, जब उन्होंने रावण का वध कर लिया था, तब उन्होंने सीता माता को वापस अयोध्या ले जाया था। सीता माता का स्वागत बड़े धूमधाम से किया गया था। लेकिन, लोगों के बीच में एक बात फैल गई थी कि सीता माता रावण के राज में रहती थी, इसलिए राम जी को सीता माता की अग्नि परीक्षा करनी पड़ी। इस परीक्षा के बाद, सीता माता ने अपनी निष्ठा और वफादारी का सबूत दिया और उसे सभी ने स्वीकार किया।

अग्नि परीक्षा का मतलब होता है कि किसी व्यक्ति की निष्ठा और वफादारी का परीक्षण अग्नि के द्वारा किया जाता है। इस परीक्षा में, सीता माता को अग्नि के ऊपर बैठा दिया गया था। राम जी ने सीता माता से कहा कि अगर वह ने कभी रावण के राज में किसी भी पुरुष के साथ अपराध किया हो तो अग्नि उसे जलाएगी। लेकिन, सीता माता ने इस परीक्षा को पारित कर लिया और सभी ने उसे स्वीकार किया।

अग्नि परीक्षा के बाद, सीता माता ने अपनी निष्ठा और वफादारी का सबूत दिया और उसे सभी ने स्वीकार किया। उन्होंने अपने पति राम जी की वफादारी, न्याय, और सत्य के प्रति अपना सम्मान प्रकट किया।

वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश

वाल्मीकि आश्रम भारत में एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थान है जो उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से 17 किलोमीटर दूर बिठूर गांव में स्थित है। इस आश्रम में वाल्मीकि मुनि ने रामायण की रचना की थी जो भारतीय साहित्य का एक प्रमुख ग्रंथ है।

वाल्मीकि आश्रम में लव-कुश का जन्म हुआ था। लव और कुश भगवान श्रीराम और माता सीता के जुड़वा बेटे थे। माता सीता ने वनवास के दौरान वाल्मीकि आश्रम में रहा था जहां उन्होंने लव-कुश को जन्म दिया था।

वाल्मीकि आश्रम के बारे में बहुत सी कहानियां हैं। एक कहानी के अनुसार, जब लव-कुश वाल्मीकि आश्रम में जन्मे थे, तब एक विदेशी राजा ने उन्हें अपने साथ ले जाकर उन्हें शिक्षा दी। लव-कुश ने शिक्षा ली और उन्होंने रामायण का गान करना शुरू किया।

वाल्मीकि आश्रम भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह स्थान धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है और लोग इसे दर्शनीय स्थल के रूप में भी जानते हैं।

संस्कृति में प्रभाव

कला और साहित्य

सीता माता भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण चरित्र हैं। उनके जीवन के प्रत्येक पहलू ने भारतीय साहित्य और कला पर गहरा प्रभाव डाला है। रामायण में सीता माता के चरित्र का वर्णन किया गया है जो भारतीय साहित्य में एक अभिन्न अंग बन गया है।

सीता माता के जीवन के अनुभवों ने भारतीय कला को भी गहरा प्रभाव डाला है। उनकी शांति और स्थैर्य की भावना भारतीय कला में एक विशेष भूमिका निभाती है। सीता माता की छवि, जैसे कि राम दरबार, रामलीला आदि में उपस्थित होती है।

समाज और धर्म

सीता माता के जीवन के प्रत्येक पहलू ने भारतीय समाज और धर्म पर गहरा प्रभाव डाला है। उन्होंने एक उत्तम पत्नी, एक उत्तम माँ, और एक उत्तम स्त्री का उदाहरण प्रस्तुत किया है।

सीता माता के जीवन के अनुभवों ने भारतीय धर्म को भी गहरा प्रभाव डाला है। उनकी भक्ति, समर्पण, और त्याग की भावना भारतीय धर्म में एक विशेष भूमिका निभाती है। सीता माता को धर्म की एक उत्कृष्ट अवतार माना जाता है जो भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।

Frequently Asked Questions

महत्वपूर्ण प्रश्न –

सीता माता की कहानी क्या है?

सीता माता भगवान राम की पत्नी थीं। उनकी जन्म कथा रामायण में विस्तार से बताई गई है। उन्होंने राम के साथ अयोध्या से वनवास और लंका युद्ध में भी हिस्सा लिया। उनकी पतिव्रता, साहस और धर्म के प्रति अपार श्रद्धा की वजह से वे भारतीय महिलाओं के लिए एक आदर्श हैं।

सीता माता की आरती कैसे पढ़ते हैं?

सीता माता की आरती पढ़ने के लिए सबसे पहले आरती के लिए उपयुक्त स्थान का चयन करें। फिर आरती के शुरुआती श्लोक ‘जय जय सीताराम’ से शुरू करें। आरती के दौरान अलंकारिक वस्तुओं को सजाएं और दीपक जलाएं। आरती के अंत में आरती पढ़ने वाले को आशीर्वाद दें और फिर आरती को बंद कर दें।

सीता माता का जन्म कैसे हुआ था?

माता सीता का जन्म मिथिला के राजा जनक के घर में हुआ था। उन्होंने जमीन से खोदे हुए एक खजाने में सीता को पाया था। उन्होंने सीता को अपनी संतान के रूप में स्वीकार किया था।

सीता माता के कितने नाम हैं?

सीता माता के विभिन्न नाम हैं जैसे जानकी, मैथिली, भूमिजा, वैदेही, रामायणी, जानकनंदिनी, जानकिनायिका, जानकिसुता, जानकिरमणी, जानकिप्रिया आदि।

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