🪔 महावीर स्वामी जी की आरती (हिंदी) & (English Lyrics) PDF

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महावीर स्वामी जी की आरती (हिंदी) –

जय महावीर प्रभो,
स्वामी जय महावीर प्रभो।
कुंडलपुर अवतारी,
त्रिशलानंद विभो॥ ॥ ॐ जय…..॥

सिद्धारथ घर जन्मे, वैभव था भारी,
स्वामी वैभव था भारी।
बाल ब्रह्मचारी
व्रत पाल्यौ तपधारी ॥ ॐ जय…..॥

आतम ज्ञान विरागी,
सम दृष्टि धारी।
माया मोह विनाशक,
ज्ञान ज्योति जारी ॥ ॐ जय…..॥

जग में पाठ अहिंसा,
आपहि विस्तार्यो।
हिंसा पाप मिटाकर,
सुधर्म परिचार्यो ॥ ॐ जय…..॥

इह विधि चांदनपुर में
अतिशय दरशायौ।
ग्वाल मनोरथ पूर्‌यो
दूध गाय पायौ ॥ ॐ जय…..॥

प्राणदान मन्त्री को
तुमने प्रभु दीना।
मन्दिर तीन शिखर का,
निर्मित है कीना ॥ ॐ जय…..॥

जयपुर नृप भी तेरे,
अतिशय के सेवी।
एक ग्राम तिन दीनों,
सेवा हित यह भी ॥ ॐ जय…..॥

जो कोई तेरे दर पर,
इच्छा कर आवै।
होय मनोरथ पूरण,
संकट मिट जावै ॥ ॐ जय…..॥

निशि दिन प्रभु मन्दिर में,
जगमग ज्योति जरै।
हरि प्रसाद चरणों में,
आनन्द मोद भरै ॥ ॐ जय…..॥

🪔 महावीर स्वामी जी की आरती (हिंदी) & (English Lyrics) PDF

Mahavir Swami Ji Ki Aarti, Hindi (English Lyrics) –

Jai Mahavir Prabho,
swami jai Mahavir Prabho.
Kundalpur avatari,
Trishalanand vibho. || Om jai… ||

Siddharth ghar janme,
vaibhav tha bhari, swami vaibhav tha bhari.
Bal brahmachari vrat
palyau tapdhari || Om jai… ||

Aatma gyaan viragi,
sam drishti dhari.
Maya moh vinaashak,
gyaan jyoti jaari || Om jai… ||

Jag mein paath ahimsa,
apahi vistaryo.
Hinsa paap mitakar,
sudharm paryacharyo || Om jai… ||

Ih vidhi Chandanpur
mein atishay darshayo.
Gwaal manorath pooryo
doodh gaay payo || Om jai… ||

Pranadaan mantri ko
tumne Prabhu diya.
Mandir teen shikhar ka,
nirmit hai keena || Om jai… ||

Jaipur nrup bhi tere,
atishay ke sewi.
Ek gram teen deeno,
sewa hit yah bhi || Om jai… ||

Jo koi tere dar par,
ichha kar aavai.
Hoy manorath poorn,
sankat mit jaavai || Om jai… ||

Nishi din Prabhu mandir mein,
jagmag jyoti jarai.
Hari prasaad charano mein,
aanand mod bharai || Om jai… ||

https://shriaarti.in/

महावीर स्वामी जी की आरती का सरल भावार्थ हिंदी & English –

“Jai Mahavir Prabho, Swami Jai Mahavir Prabho.”
Glory to respected Lord Mahavir.

“Kundalpur Avatari, Trishalanand Vibho. || Om Jai…||”
Incarnated in Kundalpur, the giver of joy to Trishala. Hail thee.

“Siddhartha was home born, Vaibhav was heavy, Swami Vaibhav was heavy.”
Born in the house of Siddhartha, your glory is limitless.

“बाल ब्रह्मचारी व्रत पल्यौ तपधारी || Om Jai…||”
A young celibate, you performed severe penance. Hail thee.

′′ Self-knowledge Viragi, equal vision holder.
Being full of self-knowledge and disinterest, you used to have equal vision towards everyone.

“The destroyer of illusion, the light of knowledge continues || Om Jai… ||”
You destroyed the worldly illusion, the light of knowledge shone.

“The path of non-violence in the world, its extension.”
You spread the path of non-violence in the world.

“Violence by erasing sin, worship good religion || Om Jai… ||”
You promoted righteousness by eradicating violence and sin. Hail thee.

′′ This method is very visible in Chandanpur.
You performed extraordinary spiritual feats in Chandanpur.

“Gwal Manorath Puryo, Milk Cow Payo || Om Jai…||”
Fulfilling the wish of a milkman, you made milk available to him. Hail thee.

′′ You gave the Lord to the minister of Pranadan.
You gave salvation to the Chief Minister.

“Temple of three peaks, Keena is built || Om Jai…||”
A temple with three peaks of unequaled splendor was built. Hail thee.

′′ Jaipur Nrip is also your servant.
The king of Jaipur was also your devotee.

“One gram three days, service hit this too || Om Jai…||”
He served in three villages focusing on the welfare of the people. Hail thee.

“Whoever comes to your door with a wish.”
Those who come to your door with desires…

“Hoy Manorath Purna, Sankat Mit Jawai || Om Jai… ||”
Their wishes are fulfilled and troubles are removed. Hail thee.

“Nishi Din Prabhu Mandir Mein, Jagmag Jyoti Jarai.”
Day and night the divine light shines in your temple.

“Hari Prasad at the feet, filled with joy || Om Jai…||”
With divine blessings at your feet, the heart is filled with joy. Hail thee.

महावीर स्वामी जी की आरती का सरल भावार्थ हिंदी –

“जय महावीर प्रभो, स्वामी जय महावीर प्रभो।”
पूज्य भगवान महावीर की जय।

“कुंडलपुर अवतारी, त्रिशलानंद विभो। || ॐ जय…||”
कुण्डलपुर में अवतरित हुए, त्रिशला को आनंद दाता। आपकी जय हो.

“सिद्धार्थ घर जन्मे, वैभव था भारी, स्वामी वैभव था भारी।”
सिद्धार्थ के घर जन्मे, आपकी महिमा अपरम्पार है।

“बाल ब्रह्मचारी व्रत पल्यौ तपधारी || ॐ जय…||”
एक युवा ब्रह्मचारी, आपने कठोर तपस्या की। आपकी जय हो.

“आत्म ज्ञान विरागी, सम दृष्टि धारी।”
आत्मज्ञान और वैराग्य से युक्त होकर आप सबके प्रति समदृष्टि रखते थे।

“माया मोह विनाशक, ज्ञान ज्योति जारी || ॐ जय… ||”
आपने सांसारिक मोह माया को नष्ट कर दिया, ज्ञान का प्रकाश जगमगा उठा।

“जग में पथ अहिंसा, अपहि विस्तारयो।”
आपने विश्व में अहिंसा का मार्ग फैलाया।

“हिंसा पाप मिटाकर, सुधर्म पर्याचर्यो || ॐ जय… ||”
आपने हिंसा और पाप को मिटाकर धर्माचरण को बढ़ावा दिया। आपकी जय हो.

“इह विधि चंदनपुर में अतिशय दर्शनो।”
चंदनपुर में आपने असाधारण आध्यात्मिक करतब दिखाए।

“ग्वाल मनोरथ पूरयो, दूध गाय पायो || ॐ जय…||”
आपने एक दूधवाले की इच्छा पूरी करते हुए उसे दूध उपलब्ध कराया। आपकी जय हो.

“प्रणादान मंत्री को तुमने प्रभु दिया।”
आपने मुख्यमंत्री को मोक्ष प्रदान कर दिया.

“मंदिर तीन शिखर का, निर्मित है कीना || ॐ जय…||”
अप्रतिम वैभव वाला तीन शिखरों वाला एक मंदिर बनवाया गया। आपकी जय हो.

“जयपुर नृप भी तेरे, अतिशय के सेवी।”
जयपुर के राजा भी आपके भक्त थे।

“एक ग्राम तीन दीनो, सेवा हिट यह भी || ओम जय…||”
आपने लोगों के कल्याण पर ध्यान केंद्रित करते हुए तीन गांवों में सेवा की। आपकी जय हो.

“जो कोई तेरे दर पर, इच्छा कर आवै।”
अरमान लेकर जो आते हैं तेरे दर पर…

“होय मनोरथ पूर्ण, संकट मिट जावै || ॐ जय… ||”
उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और परेशानियां दूर होती हैं। आपकी जय हो.

“निशि दिन प्रभु मंदिर में, जगमग ज्योति जरै।”
आपके मंदिर में दिन-रात दिव्य प्रकाश चमकता रहता है।

“हरि प्रसाद चरणों में, आनंद मोद भराई || ॐ जय…||”
आपके चरणों में दिव्य आशीर्वाद से, हृदय आनंद से भर जाता है। आपकी जय हो.

महावीर स्वामी जी: जीवन परिचय और महत्व

महावीर स्वामी जी जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे। उनका जन्म वैशाली नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम सिद्धार्थ था और माता का नाम तृषला था। जैन धर्म के अनुसार, महावीर स्वामी ने अपने जीवन के दौरान अनेक तपस्याएं की और धर्म के उपदेश दिए।

महावीर स्वामी जी ने अहिंसा को अपना आदर्श बनाया था। उन्होंने अहिंसा के माध्यम से जीवन जीने का संदेश दिया था। उनके उपदेशों में सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य और अनेक विधियाँ शामिल थीं। इन उपदेशों के अनुसार, एक व्यक्ति को सभी जीवों के प्रति सम्मान देना चाहिए और किसी भी जीव को नुकसान पहुँचाना नहीं चाहिए।

जन्म और बाल्यकाल

जन्म स्थल

महावीर स्वामी जी का जन्म ईसा पूर्व 599 वर्ष में कुण्डग्राम (बिहार) में हुआ था। वर्तमान में वैशाली (बिहार) के वासोकुण्ड को यह स्थान माना जाता है। जैन ग्रंथों के अनुसार जन्म के बाद देवों के मुखिया, इंद्र ने मेरु पर्वत पर ले जाकर बालक का क्षुधार्त शरीर शुद्ध कर दिया था।

बाल्यकाल की कथाएं

महावीर स्वामी जी के जन्म के बाद उनके पिता का नाम राजा सिद्धार्थ था और माता का नाम त्रिशला था। उनके पिता राजा सिद्धार्थ ने उन्हें राजा बनाने के लिए बहुत अधिक शिक्षा दी थी। महावीर स्वामी जी के बचपन के दिनों में उन्हें बड़ी विद्या मिली थी। वे बहुत ही बुद्धिमान थे और अपनी बुद्धिमता का उपयोग अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में करते थे।

एक दिन महावीर स्वामी जी को अपने जीवन का उद्देश्य ढूंढने की इच्छा हुई। उन्होंने अपनी समस्त संपत्ति को छोड़ दिया और एक संन्यासी के रूप में जीवन जीना शुरू किया। उन्होंने अपने जीवन के बाद जैन धर्म की स्थापना की थी। उन्होंने अपने जीवन के दौरान अनेक उपदेश दिए थे, जो आज भी लोगों के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में काम में लिए जाते हैं।

अनुयायी बनने का मार्ग

दीक्षा

महावीर स्वामी जी के अनुयायी बनने का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग दीक्षा है। दीक्षा के बाद उन्हें जैन धर्म के महाव्रतों का पालन करना शुरू कर दिया जाता है। दीक्षा के बाद, उन्हें अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य और अनेकांतवाद के महाव्रतों का पालन करना पड़ता है।

दीक्षा के बाद, उन्हें अपने शरीर, मन और आत्मा को संयमित करना सिखाया जाता है। उन्हें अपने शरीर को अपने वश में करना सिखाया जाता है ताकि वे अपने शरीर को अपनी इच्छानुसार नहीं चलायें। उन्हें अपने मन को शांत करना सिखाया जाता है ताकि वे अपने मन को अपनी इच्छानुसार नहीं चलायें। उन्हें अपनी आत्मा को जानना सिखाया जाता है ताकि वे अपनी आत्मा को समझ सकें।

महाव्रती जीवन

महावीर स्वामी जी के अनुयायी बनने के लिए, उन्हें जैन धर्म के महाव्रतों का पालन करना पड़ता है। इन महाव्रतों का पालन करना बहुत मुश्किल होता है, लेकिन उन्हें इन्हें पालन करना पड़ता है ताकि वे जैन धर्म के अनुयायी बन सकें।

अहिंसा का पालन करना उन्हें दूसरों के प्रति अहिंसा करने की शिक्षा देता है। सत्य का पालन करना उन्हें दूसरों के साथ सत्य का बोलने की शिक्षा देता है। अपरिग्रह का पालन करना उन्हें अपनी इच्छाओं को नियंत्र

उपदेश और शिक्षाएँ

अहिंसा

महावीर स्वामी जी ने अहिंसा को जीवन का मूल मंत्र माना था। उन्होंने सिद्धांत किया था कि हर जीव जंतुओं, पक्षियों, कीटों, आदि का अधिकार जीवों के निजी अधिकार से पहले आता है। इसलिए, हमें हमेशा अहिंसा का पालन करना चाहिए।

सत्य

महावीर स्वामी जी ने सत्य को जीवन का दूसरा मंत्र माना था। उन्होंने सिद्धांत किया था कि सत्य का पालन करना जीवन का सबसे बड़ा धर्म है। उन्होंने शिष्यों को यह सिखाया कि सत्य का विरोध करने वाले लोगों से दूर रहना चाहिए।

अस्तेय

महावीर स्वामी जी ने अस्तेय को जीवन का तीसरा मंत्र माना था। उन्होंने सिद्धांत किया था कि अस्तेय का पालन करना जीवन का एक महत्वपूर्ण धर्म है। उन्होंने शिष्यों को यह सिखाया कि वे दूसरों की संपत्ति चुराने या अन्य विधियों से लाभ उठाने से बचें।

ब्रह्मचर्य

महावीर स्वामी जी ने ब्रह्मचर्य को जीवन का चौथा मंत्र माना था। उन्होंने सिद्धांत किया था कि ब्रह्मचर्य का पालन करना जीवन का एक महत्वपूर्ण धर्म है। उन्होंने शिष्यों को यह सिखाया कि वे अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में ब्रह्मचर्य का पालन करें।

अपरिग्रह

महावीर स्वामी जी ने अपरिग्रह को जीवन का पांचवां मंत्र माना था। उन्होंने सिद्ध

महावीर स्वामी और जैन धर्म

जैन धर्म का प्रसार

जैन धर्म भारतीय उपमहाद्वीप में उत्पन्न हुआ था। यह धर्म वैदिक धर्म से अलग होता है और जैन धर्म के अनुयायी जैन कहलाते हैं। इस धर्म का प्रसार भारत के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, ताइलैंड और मलेशिया जैसे देशों में भी हुआ है। जैन धर्म के अनुयायी अपने धर्म के नियमों का पालन करते हैं और जैन धर्म के तीर्थंकरों को अपने आदर्श मानते हैं।

महावीर स्वामी के अनुयायी

महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर हैं। वे वर्धमान महावीर के नाम से भी जाने जाते हैं। महावीर स्वामी के अनुयायी जैन धर्म के सभी नियमों का पालन करते हैं और उन्हें अपने आदर्श मानते हैं। उनका जन्म लगभग 599 ईसा पूर्व में हुआ था।

महावीर स्वामी के अनुयायी जैन धर्म के नियमों का पालन करते हैं। जैन धर्म के नियमों में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह शामिल हैं। जैन धर्म के अनुयायी अपने आदर्शों के अनुसार जीवन जीते हैं और समय-समय पर जैन धर्म के तीर्थंकरों की जीवन गाथाओं को अपने जीवन में अपनाते हैं।

जैन धर्म के अनुयायी अपने धर्म के नियमों का पालन करते हैं और उन्हें अपने आदर्श मानते हैं। ज

महावीर स्वामी का निर्वाण

महावीर स्वामी जी जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर हैं। उनका निर्वाण चैत्र कृष्ण 5-7 युगाब्द 5124 (12-14 मार्च 2023) को हुआ था। महावीर स्वामी जी का जीवन त्याग व तपस्या से परिपूर्ण था। उन्होंने अपने जीवन के दौरान जैन धर्म के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को बताया था।

महावीर स्वामी जी के निर्वाण के बाद, उनके शिष्यों ने उनके उपदेशों को जमा करके जैन धर्म की आधिकारिक ग्रंथ जिनागम को बनाया। इस ग्रंथ में महावीर स्वामी जी के उपदेशों का समावेश है।

महावीर स्वामी जी ने अहिंसा के महत्व को समझाया था। उन्होंने अहिंसा को जीवन का मूलमंत्र बताया था। उन्होंने बताया था कि सभी जीवों को समान रूप से समझा जाना चाहिए और उन्हें कभी भी नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए।

महावीर स्वामी जी ने अपने जीवन के दौरान अनेक तपस्याओं को पूरा किया था। उन्होंने अपने जीवन के दौरान भूखे रहकर और ध्यान में लगे रहकर अपने शरीर को बहुत कम आहार देते थे। उन्होंने अपने जीवन के दौरान अपने शरीर को बहुत अधिक तपस्या दी थी।

इस प्रकार, महावीर स्वामी जी ने जैन धर्म के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को बताया था और अपने जीवन के दौरान तपस्या दी थी। उनका निर्वाण जैन धर्म

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